सिल्क्यारा सुरंग दुर्घटना के सबक
अजीत द्विवेदी
उत्तराखंड के उत्तरकाशी की सिल्क्यारा की निर्माणाधीन सुरंग में हुए दुखद हादसे का अंत सुखद रहा है। सुरंग में फंसे सभी 41 मजदूरों को 17वें दिन सकुशल निकाल लिया गया। लेकिन इस घटना से कुछ सवाल खड़े हुए हैं और कुछ सबक भी मिले हैं, जिन पर सरकारों के साथ साथ इस तरह के सामरिक व रणनीतिक रूप से अहम और बेहद संवेदनशील काम करने वाली निजी कंपनियों को भी ध्यान देना चाहिए। इस हादसे के बाद एक अच्छी बात यह भी हुई है कि केंद्रीय सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने देश के अलग अलग हिस्सों में बन रही इस तरह की 19 सुरंगों के कामकाज की समीक्षा करने का फैसला किया है। अगर इससे सबक लेकर मंत्रालय यह सुनिश्चित करता है कि किसी दूसरी निर्माणाधीन सुरंग में इस तरह का हादसा नहीं होगा तो यह माना जाएगा कि सिल्क्यारा सुरंग में 41 मजदूरों की जिंदगियों का दांव पर लगना सार्थक साबित हुआ। दूसरे, इस मामले में सुरंग बनाने वाली निजी कंपनी को जिम्मेदार ठहराना, उस पर आरोप लगाना, उसे सजा देने की मांग करना, उससे जुर्माना वसूलने की सलाह देना भी एक किस्म का राजनीतिक नैरेटिव है, जिससे बचना चाहिए।
सबको पता है कि इस तरह की सुरंग पहाड़ी इलाकों में बनाई जाती हैं। उत्तराखंड से लेकर हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर तक और उधर पूर्वोत्तर के राज्यों में ऐसी सुरंगें बनाई जाती हैं और इनका निर्माण निजी कंपनियां ही करती हैं। इन सुरंगों के निर्माण के एक साथ कई मकसद होते हैं। एक मकसद तो लोगों के लिए आवाजाही की सुविधा उपलब्ध कराना है लेकिन साथ ही इसका बड़ा सामरिक व रणनीतिक महत्व होता है। संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में, जहां चीन और पाकिस्तान दोनों की तरफ से सुरक्षा खतरा बना हुआ है, वहां इन सुरंगों से हर मौसम में निर्बाध परिवहन सुनिश्चित होता है। कमजोर होते पहाड़ों में इस तरह की सुरंगों का निर्माण हमेशा जोखिम का काम होता है। इसलिए सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करने की मांग जरूर होनी चाहिए और साथ ही पर्यावरण विशेषज्ञों की राय लेने और उन्हें अनिवार्य रूप से मानने की बात भी भी होनी चाहिए लेकिन सुरंग बनाने वाली कंपनियों को सजा देने की मांग उचित नहीं है।
आखिर सुरंग बना रही निजी कंपनी ने ही दिल्ली की एक निजी कंपनी के सम्पर्क किया और एक दर्जन रैट माइनर्स बुलाए, जिन्होंने सिर्फ 21 घंटे में आखिरी 12 मीटर की मैनुअल खुदाई कर दी और मजदूरों को बाहर निकाल लिया। इसलिए यह ध्यान रखने की जरूरत है कि कमजोर या कच्चे पहाड़ या इंसानी अतिक्रमण का शिकार हुए पहाड़ों में इस तरह की परियोजनाओं के साथ ऐसी दुर्घटनाएं होंगी। जरूरत इस बात की है कि उन्हें कैसे रोका जाए और हादसे के बाद जान-माल का नुकसान कैसे कम से कम हो यह सुनिश्चित किया जाए। सुरंग का निर्माण कर रही कंपनी और सरकार के ऊपर इस बात का दबाव जरूर बनना चाहिए कि वह मजदूरों को पर्याप्त मुआवजा दे। मजदूर और उनके परिजन जिस सदमे में थे और उन्होंने जो तनाव झेला है उसकी भरपाई निश्चित रूप से की जानी चाहिए। इस मामले में चिली की 2010 की घटना से सबक लिया जा सकता है, जिसमें एक अमेरिकी कंपनी के लिए काम कर रहे मजदूर कॉपर की खदान में फंस गए थे। निकलने के बाद उन सबको बड़ा मुआवजा मिला था। कई मजदूरों को तो जीवन भर पेंशन की व्यवस्था हुई थी।
बहरहाल, सिल्क्यारा सुरंग के हादसे ने एक चीज और प्रमाणित की है कि संकट के समय पूरा देश और सारी एजेंसियां एक हो जाती हैं। संकट के समय ही देश और समाज का वास्तविक चरित्र सामने आता है। दिवाली के दिन सुबह हुए इस हादसे के बाद जिस तरह से केंद्र व राज्य की सारी एजेंसियों ने मिल कर काम किया वह काबिले तारीफ है। इससे यह साबित हुआ कि अगर आपदा प्रबंधन की सारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाए तो किसी भी संकट में जान-माल के नुकसान को रोका जा सकता है या कम किया जा सकता है। सिल्क्यारा सुरंग में फंसे मजदूरों को बाहर निकालने के लिए राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एनडीएमए, राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यानी एसडीएमए, बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन यानी बीआरओ, इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस यानी आईटीबीपी, नेशनल हाईवे इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी एनएचआईडीसीएल और अंत में भारतीय सेना ने बेहतरीन तालमेल के साथ काम किया। केंद्र और राज्य सरकार ने निरंतर निगरानी रखी और जब जिस मशीन की जरूरत हुई उसे दश के अलग अलग राज्यों से विशेष विमान के जरिए लाकर घटनास्थल तक पहुंचाया गया।
ध्यान रहे चिली से लेकर चीन और अमेरिका से लेकर थाईलैंड तक इस तरह की दुर्घटनाएं हुई हैं और कई जगह फंसे हुए मजदूरों को निकालने में महीनों लगे हैं। चिली में 2010 में एक अमेरिकी कॉपर कंपनी की खदान में 33 मजदूर फंसे थे और उन्हें सुरक्षित निकालने में 69 दिन का समय लगा था। सबसे ताजा मामला थाईलैंड का है, जहां 2018 में एसोसिएशन फुटबॉल टीम के 12 बच्चे और उनके कोच एक सुरंग में फंस गए थे। उन्हें निकालने में 10 हजार लोगों की टीम लगी थी, जिसमें 90 गोताखोर थे। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से लेकर चीन, रूस, ब्रिटेन आदि देशों के सुरंग और राहत व बचाव कार्य के विशेषज्ञ घटनास्थल पर पहुंचे थे और 18 दिन के अथक प्रयास के बाद सबको सुरक्षित बाहर निकाला गया था। ऐसे ही सिल्क्यारा सुरंग हादसे के बाद भी दुनिया भर के विशेषज्ञ घटनास्थल पर पहुंचे, सारी एजेंसियों ने एक होकर बचाव के लिए काम किया, आम लोगों और स्थानीय प्रशासन का पूरा सहयोग इस प्रक्रिया में रहा और अंत में 17 दिन की मेहनत रंग लाई।
इस घटना का एक सबक यह है कि सरकार सभी निर्माणाधीन सुरंगों की सुरक्षा की समीक्षा करा रही है। इस सबक को ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत है। सिर्फ निर्माणाधीन सुरंगों की सुरक्षा की समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी। इस तरह की जितनी भी परियोजनाएं हैं, जो पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील इलाकों में चल रही हैं उन सबकी समीक्षा करने की जरूरत है। सिल्क्यारा सुंरग हादसे के बाद मदद के लिए पहुंचे ऑस्ट्रेलिया के सुरंग विशेषज्ञ आर्नोल्ड डिक्स ने बहुत भावुक होकर एक मौके पर कहा कि ‘हम पहाड़ से अपने बच्चे मांग रहे हैं’। पहाड़ विशालता और उदारता का प्रतीक होते हैं। इसलिए डिक्स पहाड़ से अपने बच्चे लौटा देने की अपील कर रहे थे। सरकारों और तमाम निर्माण एजेंसियों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि पहाड़ या प्रकृति हमेशा ऐसी उदारता नहीं दिखाएंगे।
अगर समझदारी नहीं दिखाई गई तो आने वाले समय में संकट गहराएगा। इसलिए पहाड़ों, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और निर्माण को समय रहते रोका जाना चाहिए। सिर्फ सुरक्षा की समीक्षा पर्याप्त नहीं होगी। उसके साथ साथ पहाड़ों और जंगलों में चलने वाली तमाम व्यावसायिक गतिविधियों की समीक्षा होनी चाहिए और दीर्घावधि की योजना बननी चाहिए। ऐसा कोई काम नहीं होना चाहिए, जिससे प्रकृति का बनाया संतुलन बिगड़े। अन्यथा उत्तराखंड और हिमाचल के पहाड़ों में पिछले कुछ समय से हो रही दुर्घटनाओं को रोकना नामुमकिन हो जाएगा।


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